Monday, October 16, 2017

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ४: तिसरा दिन- भोर- मांढरदेवी- वाई

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा १: असफलता से मिली सीख 
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा २: पहला दिन- चाकण से धायरी (पुणे) 
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ३: दूसरा दिन- धायरी (पुणे) से भोर
 

४: तिसरा दिन- भोर- मांढरदेवी- वाई

३० सितम्बर| रात अच्छी नीन्द हुई| सुबह नीन्द जल्द खुली| पास से ही निरा नदी बह रही है! शाम के समय पता नही चला, लेकीन अब उसकी गूँज सुनाई दे रही है! मेरे जल्द उठने कारण घर में सब जल्द उठ गए| आज दशहरे का दिन है! आज मेरी पहली परीक्षा होगी|‌ पहले लगा था कि कोहरा होने से थोड़ी देर से निकलना पड़ेगा| लेकीन समय पर सवा छह बजे निकल पाया| मित्र दत्ताभाऊ ने वाई में भी एक लॉज बताया है, आज वही ठहरूँगा| भाभीजी ने सुबह जल्दी उठ कर मेरे लिए नाश्ता बनाया| भूख़ तो नही है, फिर भी वह खा कर निकला| दोस्त के घर से निकला| साईकिल यात्रा के लिए आदर्श मौसम| बारीश रूक गई है, लेकीन माहौल बारीश जैसा है!

भोर गाँव से निकलते ही हल्की चढाई शुरू हुई| इसके साथ धीरे धीरे दूर दिखाई देनेवाले पहाड़ भी करीब आने लगे| मराठा इतिहास की दृष्टि से रोहिडेश्वर किला महत्त्वपूर्ण है| यहीं शिवाजी महाराज ने स्वराज्य स्थापना की शपथ ली थी! वही रोहीडेश्वर किले के करीब से यह सड़क जाएगी| मन में हल्का सा डर भी है| क्या यह पहला घाट मुझे पास करेगा? हल्की चढाई दस किलोमीटर तक है और घाट छह किलोमीटर का है| सड़क बहुत बढ़िया बनी है| बरसाती मौसम के बाद भी सड़क अच्छी है| छोटे छोटे गाँव लग रहे हैं| एक गाँव में दूर से एक गाना सुनाई दिया| गाना तो जाना पहचाना है, लेकीन सुनाई नही दे रहा है| पास जाने पर सुनाई दिया| इससे माहौल और भी आकर्षक बना| हर गाँव में नवरात्रि का त्यौहार मनाया जा रहा है|






रोहिडेश्वर का पहला दर्शन!




Saturday, October 14, 2017

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ३: दूसरा दिन- धायरी (पुणे) से भोर










: दूसरा दिन- धायरी (पुणे) से भोर

२९ सितम्बर| कल रात अच्छी नीन्द हुई| आज इस यात्रा का दूसरा दिन है और आज एक घाट भी पार करना है| हालांकी, अब टनेल होने के कारण यह घाट अब सिर्फ मामुली चढाई ही रह गया है| फिर भी शुरू में लगातार बारह किलोमीटर तक चढाई होगी, उसके बाद पच्चीस किलोमीटर तक उतराई और बाद में थोड़ी चढाई- उतराई रहेगी| आज से मेरे लिए बिल्कुल नया रास्ता शुरू हो जाएगा|

सुबह निकलते समय लगा था कि शायद कोहरे के कारण थोड़ा लेट निकलना पड़ेगा| लेकीन समय पर निकल गया| सामान बान्धने में थोड़ी दिक्कत हो रही है| उसे बार बार रूक कर ठीक करना पड़ा| सुबह इतने जल्दी मुझे मेरी एक दोस्त ने शुभकामनाएँ दी| ऐसी दोस्त जो मेरे लेखन के कारण मुझसे जुड़ी! जल्द ही टनेल के पहले की चढ़ाई शुरू हुई| याद आ रही हैं अतीत की कुछ राईडस जो मैने इस रोड़ पर की थी| सुबह की ताज़गी और ठण्ड में चढाई भी कुछ खास नही लगी| धीरे धीरे आगे बढ़ता गया| अब टनेल आएगा| उसके लिए एक जगह पर रूक कर ब्लिंकर शुरू कर लिया| लगभग डेढ किलोमीटर का यह टनेल है| इस टनेल के बाद माहौल बदल ही जाएगा| बड़ा फैला हुआ कॅनव्हास सामने आएगा और लम्बी उतराई भी शुरू होगी| इसी चढाई के बीच एक खूबसूरत झील दिखी जो अब धीरे धीरे शहर में खो जा रही है| शहर इसे निगल रहा है|



























जांभुळवाडी लेक या उसका बचा हुआ छोटासा हिस्सा!






























टनेल के पहले का दृश्य


Wednesday, October 11, 2017

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा २: पहला दिन- चाकण से धायरी (पुणे)


योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा १: असफलता से मिली सीख


: पहला दिन- चाकण से धायरी (पुणे)

२८ सितम्बर| सुबह जल्द उठ कर निकलना है| आज पहला दिनहै, लेकीन सामान बान्धना, सब चीज़ें साथ में रखना इसकी तैयारी पहली की है| इसलिए सुबह आराम से निकला| मन बिल्कुल शान्त है| कल से कुछ भी तनाव नही है| बिजनेस एज युज्वल जैसा ही लग रहा है| पूरा उजाला होने के पहले पौने छे बजे निकला हूँ| आज का पड़ाव वैसे बहुत छोटा है| पहले कई बार यह दूरी पार भी की है| करीब सवा तीन घण्टों में पहुँचूंगा ऐसी उम्मीद है|

सुबह का सन्नाटा, हल्की सी ठण्ड और ताज़गी! और एक अन्जान यात्रा का आरम्भ! मन में अपनेआप गीत गूँजने लगा- तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो! उसके बाद अपने आप पूरा गाना बजता गया और मै सुनता गया| अगर कोई गाना- सिर्फ उसके बोल नही, उसका पूरा संगीत अगर याद हो, तो मन ही मन ऐसा गाना सुनने में बड़ा मज़ा आता है| इसके बाद दूसरा गाना मन में बजने लगा- तू मेरे साथ साथ आसमाँ से आगे चल, तुझे पुकारता है तेरा आनेवाला कल, नई हैं मन्जिलें, नए हैं रास्ते, नया नया सफर है तेरे वास्ते!



पहली नदी- इन्द्रायणी!





































Monday, October 9, 2017

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा १: असफलता से मिली सीख

नमस्ते! साईकिलिंग दोबारा शुरू कर चार साल हो चुके हैं| साईकिल ने इतना कुछ सीखाया, इतनी नई दृष्टि दी! इस पूरी यात्रा में साईकिल के साथ कई दिग्गज साईकिलिस्ट, फिटनेस के खिलाडी और प्रेरणा देनेवाले लोग मिलते रहे हैं| इस विवरण को शुरू करने के पहले उन सबको एक बार नमन करता हूँ|

मेरी पीछली अन्तिम साईकिल यात्रा या बड़ी राईड २०१५ के दिसम्बर में हुई थी|‌ तब दूसरे ही दिन मै पूरी तरह थक गया था| और जैसे लगा कि साईकिल चलानी छोड ही देनी चाहिए| हर साईकिलिस्ट के अनुभव में यह जरूर आता है| लेकीन खैर, साईकिल नही छूटी| कुछ दिनों के बाद ही लम्बी यात्राओं के सपने दिन में आने लगे| २०१५ में ही लदाख़ की आंशिक यात्रा की थी, तो लगा कि २०१६ में भी एक बार ट्राय करता हूँ| पहले के अनुभवों से सचेत हो कर और बेहतर तैयारी शुरू की| इस बार स्टैमिना और फिटनेस को और बढ़ाने के लिए रनिंग शुरू किया| रनिंग शुरू करना कठिन रहा| शारीरिक रूप से नही, बल्की मानसिक रूप से| कई दशक पहले जब स्कूल में कभी दौड़ा करता था तो सब चिढाते थे कैसा दौड़ता है यह! वह बात अब भी मन में थी| इसलिए लगा की सुबह के अन्धेरे में ही दौड़ूंगा! लेकीन सुबह के अन्धेरे में दौड़ने के लिए बहुत जल्द उठना पड़ता है! वो तो अक्सर नही ही होता था| लेकीन फिर भी धीरे धीरे दौड़ना शुरू किया| पहले दो दिन तो पाँच किलोमीटर चला और उसमें सिर्फ सौ सौ मीटर दौड़ता था, हाँफता था और फिर कुछ समय खड़े रह कर दौड़ता था| उसे चलना और थोड़ासा जॉगिंग ही कहना चाहिए| ऐसे २-३ दिन जाने के बाद धीरे धीरे पूरे पाँच किलोमीटर जॉगिंग कर सका| उसमें भी बहुत बार रूकना पड़ता था| लेकीन धीरे धीरे कुछ ही हफ्तों में रफ्तार भी बढी और आसानी भी होने लगी| ऐसे करते करते एक ही बार में दस किलोमीटर की भी दौड़ लगा सका| चलो, साईकिलिंग के साथ यह भी बहुत सीखना हुआ, स्वास्थ्य और फिटनेस की दिशा में एक कदम और आगे जाने लगा|






लेकीन २०१६ में लदाख़ की साईकिल यात्रा नही हो पायी| तैयारी बहुत की, बहुत योजना बनाई| लेकीन फिर भी साईकिलिंग का उतना अभ्यास नही कर पाया| और एक बड़ी राईड ने घूटने (सचमूच) टेकने के लिए मजबूर कर दिया| तब तय किया की लदाख़ नही जाऊँगा| लेकीन फिर भी २०१६ के मान्सून में भी डे- ड्रिमिंग करता था कि इधर जाऊँगा| ये ये देखूँगा| लेकीन कहीं भी नही जा सका| बस कुछ प्रैक्टीस राईडस ही हुईं और यदा कदा दौड़ना हुआ| एक तरह से मन में बार बार लग रहा था कि लम्बी साईकिल यात्रा करना मेरे बस में नही है! खैर|

भला हो उन लोगों का जो अक्सर दूसरों को प्रेरणा देते रहते हैं| कई साईकिलिस्ट के विवरण पढ़ता था| एक बार तो लगा भी कि अब क्यों ये सब पढ़ें! जाने दो! लेकीन नही| साईकिल से रिश्ता टूटा नही और थोड़ी साईकिलिंग शुरू रही| इसको गति २०१७ के मई में मिली जब तय किया की २०१७ के बरसाती सीज़न में कही ना कही तो साईकिल यात्रा करनी ही है! मई से ही छोटी प्रैक्टीस राईडस शुरू की| बीच बीच में थोड़ा दौड़ता भी था| क्यों कि यह तो साफ हुआ था कि अगर स्टैमिना/ फिटनेस बढ़ाना है, तो उसका रास्ता रनिंग से जाता है| क्यों कि साईकिल चलाने की तुलना में रनिंग ज्यादा हेवी एक्टिविटी है; ज्यादा थकानेवाला व्यायाम है| इसलिए अगर मै कुछ दूरी तक रनिंग कर पाता हूँ- जैसे १० या १५ किलोमीटर तो उससे मेरा स्टैमिना बढ़ेगा और साईकिल चलाने में आसानी होगी| जल्द नही थकूँगा| इस सोच के साथ दौड़ना भी चालू था| मन बना लिया था|



Sunday, October 8, 2017

एक ड्रीम साईकिल यात्रा!!!!


एक ऐसी साईकिल यात्रा जिस पर मुझे अब तक भरोसा नही आ रहा है! बरसों का एक सपना सा पूरा हो गया है! महाराष्ट्र में महाबळेश्वर हिल स्टेशन और उसके आस- पास के अनुठे प्राकृतिक सुन्दरता से सजे क्षेत्र में सात दिन की साईकिल यात्रा सफल हुई| अब धीरे धीरे उसके बारे में लिखूँगा| शुरुआत आज इस पोस्ट से करता हूँ|‌ इसकी योजना क्या थी, किस थीम के साथ यह यात्रा की यह बताता हूँ| आज सिर्फ इतना कहूँगा की ठीक इसी योजना जैसी यात्रा रही| बिल्कुल भी बदलाव करने की ज़रूरत नही हुई| बहुत ही रोमँटिक या कहें तो रोमँटिकेस्ट साईकिल यात्रा रही!!! आईए, इसकी योजना से शुरुआत करते हैं|










































योग- ध्यान के लिए साईकिल यात्रा

नमस्ते! योग- ध्यान यह थीम ले कर एक साईकिल यात्रा करने जा रहा हूँ| साईकिल चलाने का करीब से सम्बन्ध योग और ध्यान से है| इतना ही नही, साईकिल चलाना, दौड़ना, अलग तरह के स्पोर्टस या नृत्य इन सब का सम्बन्ध योग और ध्यान से है| पश्चिमोत्तानासन जैसे कुछ आसन कठिन होते हैं| या सूर्य नमस्कार की तीसरी स्थिति में कई लोगों के हाथ जमीन को स्पर्श नही कर पाते हैं| लेकीन साईकिलिंग- रनिंग के साथ ऐसे आसन करना आसान होता है| इसके साथ एंड्युरन्स की गतिविधि में हृदय अधिक हवा पंप करता है| इसलिए साईकिल जैसे व्यायाम के बाद भस्त्रिका जैसा प्राणायाम भी अधिक शक्ति के साथ किया जा सकता है| साईकिल चलाते समय एक बात होती है कि हमारी गति कम हो जाती‌ है| अक्सर हमें गति की आदत होती है| लेकीन साईकिल चलाते समय हम धिमे से बढ़ते हैं और हमारी 'सजगता' बढ़ती है| उसके साथ साँस लेने की क्षमता भी बढ़ती है| गहरी साँस लेने की क्षमता ध्यान की बुनियाद होती है| इसके अलावा जब हम किसी प्राकृतिक क्षेत्र में घूमने जाते हैं, तब हमारा हर रोज का रूटीन अलग रह जाता है और एक गैप क्रिएट होता है| प्रकृति हमें शान्त करती है, रिचार्ज कराती है| इस कारण साईकिल चलाने में एक डायनॅमिक मेडिटेशन भी होता है|




Wednesday, September 27, 2017

ध्यान- योग के लिए साईकिल यात्रा

हॅलो, नमस्ते!

बरसाती मौसम में एक साईकिल यात्रा करने जा रहा हूँ| महाराष्ट्र में महाबलेश्वर- सातारा क्षेत्र में साईकिल पर घूमने जानेवाला हूँ| यह यात्रा एक आनन्द के साथ एक सोच के साथ भी कर रहा हूँ| ध्यान- योग के लिए साईकिल चलाऊँगा| क्यों कि ध्यान- योग का करीब से सम्बन्ध साईकिल से भी है| योग सिर्फ वह नही जो हम आसन- प्राणायाम के साथ करते हैं| बल्की योग तो जीवन की हर अभिव्यक्ति में हैं| योग वह दिशा है, जहाँ जाने के कई मार्ग है| और आसनों की भी बाद करें तो योग आसनों का अभ्यास करना और कई तरह के शारीरिक खेल जैसे दौड़ना, साईकिल चलाना या नृत्य इनमें भी बहुत भेद नही है| यह कहना ठीक होगा की योग और ये शारीरिक खेल बहुत हद तक समानान्तर है| जैसे कोई अगर कठिन लगनेवाला आसन जैसे पश्चिमोत्तानासन नही कर पाता हो या किसी के हाथ सूर्य नमस्कार की तीसरी स्थिति में पैर को स्पर्श नही करते हो, तो साईकिलिंग, रनिंग या नृत्य जैसे शारीरिक व्यायामों से भी उसे वह आसन करने में मदद होती है|

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि गीता सिर्फ ग्रन्थ में पढने जैसी नही है, कोई उसे फूटबॉल के ग्राउंड पर भी आत्मसात कर सकता है| ठीक वैसे ही, किसी भी शारीरिक एक्टिविटी में योग समाहित होता है| और साईकिलिंग जैसी लम्बी एक्टिविटी में योग के साथ ध्यान भी होता है क्यों कि यह जितना शरीर का है, उतना ही मन का भी है| साईकिल से जाते हैं तब मन शान्त होता है, धिमी गति के साथ मन को खुद को ढालना होता है| तथा बहुत धैर्य रख कर आगे बढ़ना होता है| इसलिए उसमें योग के साथ ध्यान भी सम्मीलित है|

इस बार जिस क्षेत्र में साईकिलिंग करूँगा, वह ध्यान एवम् योग के लिए भी अनुकूल है| महाबळेश्वर का पहाड़ी स्थान और सह्याद्री के अन्य पहाड़! यहाँ आने पर मन अपने आप शान्त हो जाता है| जितना हम प्रकृति के पास जाएंगे, उतने शांत होते हैं| वहाँ ध्यान प्राकृतिक रूप से घटित होता है| इसलिए हमें ऐसी जगह जा कर बहुत ताज़गी का अनुभव होता है| इस यात्रा में जहाँ जाऊँगा वे सभी स्थान एक अर्थ में ध्यान- योग या भक्ति- शक्ति के प्रतिक है| जैसे पुणे में भक्ति- शक्ति चौक जो शिवाजी महाराज और सन्त तुकाराम की मुलाकात का प्रतिक है| सातारा में अजिंक्यतारा किला जो शिवाजी महाराज के स्वराज्य का एक केन्द्र था और सज्जनगड जो रामदास स्वामी का केंद्र था, इन स्थानों पर भी साईकिलिंग करूँगा| 

पहले के साईकिलिंग के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए काफी कुछ तैयारी की है| और दूरी भी छोटी ही रखी है| हर रोज ५०- ६० किलोमीटर तक ही साईकिल चलाऊँगा| कुल सांत- आठ दिन का कार्यक्रम है| देखते है कैसे होता है| इतना तो तय है कि साईकिलिंग कई दिनों तक करना यह शरीर के जितना या उससे भी अधिक मन का ही खेल है| 

यात्रा पूरी होने पर यहीं पर जानकारी दूँगा| धन्यवाद| 


























Monday, August 28, 2017

A noble initiative with a wonderful challenge

Hello. 

This is to inform you regarding one noble initiative and a wonderful challenge. Shri. Harshad Pendse from Pune is shortly going to complete Khardungla ultra marathon which involves running of 72 km at height above 5000 meters. It is called as Khardungla challenge. 

Shri. Pendse has decided to dedicate this expedition to a voluntary organization Maitri based in Pune. In words of Shri. Pendse himself- "I am a person who has varied interests and it becomes very difficult for me to stay put with single interest. However there are few things that have had my my interest for years now. Running and Maitri are two amongst them. I started volunteering for Maitri in 2012 and started running in 2013. Both have a very special place in my life. This year I have taken up a challenge of running at Khar Dung La in Ladakh region. Its an ultra Marathon (72 Kms) at high altitude. I am dedicating this run to Maitri, an NGO working at Melghat for the upliftment of the Korku Tribe and arresting child deaths due to malnutrition. I intend to gather minimum 72 donors who will donate minimum 1k to Maitri. (From his facebook page: Run for Maitri: https://www.facebook.com/runformaitri)

I have myself contributed for this noble initiative. Earlier I had worked with Maitri organization during Uttarakhand relief work 2013. Maitri is working in many areas. More details can be found at: http://maitripune.net

But this is not just fund raising activity, it is a great inspiration, it is a challenge to everyone, motivation to everyone. For preparing for this mission, Shri. Harshad Pendse have run for greater distances such as 35 kms, 45 kms and even 50 kms. He makes it look so easy, he says that as I can do this, anyone can do this. He says that he is also surprised by his capacity! So, this is a great motivation for all. And so I was inspired by him and started running consistently. It gave me new vision not only about running, but also about fitness, stamina and our latent potential. 

I am happy to say that taking inspiration from him, I started running regularly and completed my first informal half- marathon near Parbhani, Maharashtra on 27th August. What a feeling it was!






































Shri. Harshad Pendse's mission has received great response. More than 60 individuals have come forth and have contributed for Maitri organization. His objective of getting 72 donors is almost complete. People have contributed greatly for Maitri organization. I have myself contributed and for Maitri which works in many areas such as disaster management, tribal welfare in Melghat region (area in north Maharashtra), malnutrition etc. It is a great example of how one's passion and hard work can lead to such a noble activity and how it becomes a great inspiration.

So, while giving all the best to Shri. Harshad Pendse for his, I appeal all to take some inspiration from this and also contribute for this. All of us contribute for some organization, sure. But this is worth consideration. 

Read about this initiative of Shri. Harshad Pendse- run for Maitri- http://maitripune.net/events.php#7

Maitri website: http://maitripune.net/

Facebook page of Shri. Harshad Pendse: https://www.facebook.com/runformaitri

ONLINE DOMESTIC DONATION
Maitri Account Details (avail this facility at no cost)
Bank : H D F C Bank
Branch : Kothrud, Pune
Savings Account Number : 01491450000152
Account Name : Maitri
MICR : 411240009
Details for RTGS / NEFT / IFS Code : HDFC0000149

ONLINE FOREIGN DONATION
Maitri Account Details (avail this facility at no cost)
Bank : H D F C Bank Limited
Branch : Kothrud, Pune, Maharashtra, India.
Savings Account Number : 01491170000017
Account Name : Maitri
MICR Code : 411240009
Swift Code : HDFCINBB


If anyone from you wishes to contribute, please inform to Maitri organization: 
Registered Address:
'Kalyan', 32, Natraj Society,
Karve Nagar,
Pune 411038

Office Address:
Flat No. 9, Mahadev Smruti,
Near Balshikshan School, Mayur Colony,
Kothrud, Pune 411038


Phone: +91-20-25450882
Email : maitri1997@gmail.com

Thank you!

Tuesday, August 1, 2017

गुरू नानक की वाणि ओशो की जुबानी

नानक को जो पहली झलक मिली परमात्मा की, जिसको सतोरी कहें…वह मिली एक दूकान पर; जहां वे तराजू से गेहूं और अनाज तौल रहे थे। अनाज तौल कर किसी को दे रहे थे। तराजू में भरते और डालते। कहते–एक, दो, तीन… दस, ग्यारह, बारह…फिर पहुंचे वे, तेरा। पंजाबी में तेरह का जो रूप है, वह तेरा। उन्हें याद आ गई परमात्मा की। तेरा, दाईन, दाऊ–धुन बन गई। फिर वे तौलते गए लेकिन संख्या तेरा से आगे न बढ़ी। भरते तराजू में, डालते और कहते, तेरा। भरते तराजू में और डालते, और कहते, तेरा। क्योंकि आखिरी पड़ाव आ गया। तेरा के आगे कोई संख्या है? मंजिल आ गई। तेरा पर सब समाप्त हो गया। लोग समझे कि पागल हो गए। लोगों ने रोकना भी चाहा, लेकिन वे तो किसी और लोक में हैं। वे तो कहे जाते हैं, तेरा। डाले जाते हैं तराजू से, तौले जाते हैं और तेरा से आगे नहीं बढ़ते। तेरा से आगे बढ़ने को जगह भी कहां है?

दो ही तो पड़ाव हैं, या तो मैं या तू। मैं से शुरुआत है, तू पर समाप्ति है।

नानक संसार के विरोध में नहीं हैं। नानक संसार के प्रेम में हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि संसार और उसका बनाने वाला दो नहीं। तुम इसे भी प्रेम करो, तुम इसी में से उसको प्रेम करो। तुम इसी में से उसको खोजो।

तो नानक जब युवा हुए और घर के लोगों ने कहा शादी कर लो, तो उन्होंने नहीं न कहा। सोचते तो रहे होंगे घर के लोग कि यह नहीं कहेगा, क्योंकि बचपन से ही इसके ढंग, ढंग के नहीं थे। नानक के बाप तो परेशान ही रहे। उनको कभी समझ में न आया कि क्या मामला है। भजन में, कीर्तन में, साधु-संगत में…।

भेजा बेटे को सामान खरीदने दूसरे गांव। बीस रुपए दिए थे। सामान तो खरीदा, लेकिन रास्ते में साधु मिल गए, वे भूखे थे। बाप ने चलते वक्त कहा था, सस्ती चीज खरीद लाना और इस गांव में आ कर महंगे बेच देना। यही धंधे का गुर है। दूसरे गांव से सस्ते में खरीदना, यहां आ कर महंगे में बेच देना। यहां जो चीज सस्ती हो खरीदना, दूसरे गांव में महंगे में बेच देना। यही लाभ का रास्ता है। तो कोई ऐसी चीज खरीद कर लाना जिसमें लाभ हो। नानक लौटते थे खरीद कर, मिल गई साधुओं की एक जमात, वे पांच दिन से भूखे थे। नानक ने पूछा कि भूखे बैठे हो! उठो, कुछ करो। जाते क्यों नहीं गांव में? उन्होंने कहा, यही हमारा व्रत है। कि जब उसकी मर्जी होगी, वह देगा। तो हम आनंदित हैं। भूख से कोई अंतर नहीं पड़ता।

तो नानक ने सोचा कि इससे ज्यादा लाभ की बात क्या होगी कि इन परम साधुओं को यह भोजन बांट दिया जाए जो मैं खरीद लाया हूं! बाप ने यही तो कहा था कि कुछ काम लाभ का करो।

बांट दिया। साथी था साथ में, मित्र था साथ में, उसका नाम बाला था। उसने कहा, क्या करते हो, दिमाग खराब हुआ है? नानक ने कहा, यही तो कहा था पिता ने कि कुछ लाभ का काम करना। इससे ज्यादा लाभ क्या होगा? बांट कर बड़े प्रसन्न घर लौट आए।

इसलिए कहता हूं, ढंग के न थे। बाप ने कहा कि मूरख! ऐसे कहीं धंधा हुआ है? तू बरबाद कर देगा। और नानक ने कहा कि आप नहीं सोचते कि इससे ज्यादा लाभ की और क्या बात होगी? लाभ कमा कर लौटा हूं।

लेकिन यह लाभ किसी को दिखाई नहीं पड़ता था। नानक के पिता कालू मेहता को तो बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता था। उनको तो लगता था, लड़का बिगड़ गया। साधु-संगत में बिगड़ा। होश में नहीं है। सोचा कि शायद स्त्री से बांधने से कुछ राहत मिल जाएगी।

अक्सर ऐसा लोग सोचते हैं। सोचने का कारण है। क्योंकि संन्यासी स्त्री को छोड़ कर भागते हैं। तो अगर किसी को गृहस्थ बनाना हो, तो स्त्री से बांध दो। पर नानक पर यह तरकीब काम न आयी। क्योंकि यह आदमी किसी चीज के विरोध में न था।

बाप ने कहा, शादी कर लो। नानक ने कहा, अच्छा। शादी हो गई। लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा। बच्चे हो गए, लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा।

इस आदमी को बिगाड़ने का उपाय ही न था, क्योंकि संसार और परमात्मा में इसे कोई भेद न था। तुम बिगाड़ोगे कैसे? जो आदमी धन छोड़ कर संन्यासी हो गया, बिगाड़ सकते हो, धन दे दो। जो आदमी स्त्री छोड़ कर संन्यासी हो गया, एक सुंदर स्त्री को उसके पास पहुंचा दो, बिगाड़ सकते हो। लेकिन जो कुछ छोड़ कर ही नहीं गया, उसको तुम कैसे बिगाड़ोगे? उसके पतन का कोई रास्ता नहीं है। नानक को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।






 


















इसलिए मैं भी पक्ष में हूं कि संन्यासी तो नानक के ही होने चाहिए। क्योंकि संन्यासी वही परम है, जिसको भ्रष्ट न किया जा सके। भ्रष्ट तुम उसी को न कर सकोगे जो ठीक तुम्हारे संसार में बैठा है, और फिर भी वहां नहीं है। तुम उसे कैसे भ्रष्ट करोगे? उसने सब उपाय तोड़ दिए।
इसलिए नानक कहते हैं, कुछ छोड़ कर कहीं भागना नहीं है। जहां तुम हो, वहीं वह छिपा है। इसलिए नानक ने एक अनूठे धर्म को जन्म दिया है, जिसमें गृहस्थ और संन्यासी एक है। और वही आदमी अपने को सिक्ख कहने का हकदार है, जो गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो; संन्यासी होते हुए गृहस्थ हो। सिर के बाल बढ़ा लेने से, पगड़ी बांध लेने से कोई सिक्ख नहीं होता। सिक्ख होना बड़ा कठिन है। गृहस्थ होना आसान है। संन्यासी होना आसान है; छोड़ दो, भाग जाओ जंगल। सिक्ख होना कठिन है। क्योंकि सिक्ख का अर्थ है–संन्यासी, गृहस्थ एक साथ। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे नहीं हो। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे हिमालय पर हो। करना दूकान, लेकिन याद परमात्मा की रखना। गिनना रुपए, नाम उसका लेना।

ओशो: एक ओंकार सतनाम