Friday, May 25, 2018

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा: भाग २: परभणी- जिंतूर नेमगिरी

२: परभणी- जिंतूर नेमगिरी
११ मई को सुबह ठीक साढेपाँच बजे परभणी से निकला| कई लोग विदा देने आए, जिससे उत्साह बढा है| बहोत से लोगों ने शुभकामनाओं के मॅसेजेस भी भेजे हैं| कुछ दूरी तक मेरे प्रिय साईकिल मित्र और मेरे रनिंग के गुरू बनसकर सर भी मेरे साथ आए| मै जो एटलस साईकिल चला रहा हूँ, उनकी ही है! पैर में दर्द होने पर भी वे मेरे साथ चलने आए| कुछ समय तक उनका साथ मिला और फिर आगे बढ़ चला| योग प्रसार हेतु साईकिल के हमारे ग्रूप पर मेरा लाईव लोकेशन डाला है| आज का पड़ाव वैसे घर से आँगन तक जाने का ही है| पहले कई बार जिंतूर- नेमगिरी गया हूँ| साईकिल पर मेरा पहला शतक इसी रूट पर हुआ था, इसलिए एक तरह से आज का चरण बहुत सामान्य सा लग रहा है| जिंतूर घर से ४५ किलोमीटर है और वहाँ सामान छोड कर पास ३ किलोमीटर पर होनेवाली नेमगिरी चोटी पर जा कर आऊँगा|






३ लीटर पानी साथ ले कर जा रहा हूँ| उसमें भी इलेक्ट्रॉल मिलाया हुआ है| साथ में चिक्की- बिस्कीट भी रखा है जिसे बीच बीच में खाता रहूँगा| पहले आधे घण्टे के बाद शरीर लय में आ गया और आराम से आगे बढ़ने लगा| धूप अभी हल्की है| इस बार सोच रहा हूँ कम से कम ब्रेक लूँगा| सड़क पर होटलों में खाने के विकल्प ज्यादा नही है| इसलिए चाय बिस्किट खा के आगे बढ़ूँगा| बहोत देर तक पहला ब्रेक लेने की इच्छा नही हुई| ३० किलोमीटर पूरे होने पर बोरी नाम के गाँव में पहला ब्रेक लिया| चाय- बिस्किट लिया और आस- पास होनेवाले लोगों को मेरी यात्रा के बारे में बताया और संस्था के ब्रॉशर्स भी दिए| अब बचे हैं सिर्फ पन्द्रह किलोमीटर| लेकीन अब धूप बढ़ने लगी है और मेरे शरीर में डिहायड्रेशन के लक्षण नजर आ रहे है| शायद बड़े अन्तराल बाद पहला ब्रेक लिया, उससे ऊर्जा स्तर भी थोड़ा कम है| लेकीन आगे बढ़ता रहा| जिंतूर के छह किलोमीटर पहले चांदज गाँव में कुछ लोग सड़क पर काम कर रहे थे, उन्होने मेरा फोटो खींचा| बाद में पता चला कि वे पानी फाउंडेशन के कार्यकर्ता है और इधर के गाँवों में जल- संवर्धन (वॉटर कन्जर्वेशन) के लिए काम कर रहे हैं| महाराष्ट्र के कई गाँवों में अमीर खान के पानी फाउंडेशन का काफी अच्छा काम चल रहा है| उन्होने मेरी यात्रा को शुभकामनाएँ दी और मैने उनके कार्य को| साथ में कुछ ब्रॉशर्स भी दिए| अब जिन्तूर बस छह किलोमीटर|

Wednesday, May 23, 2018

एटलास साईकिल पर योग- यात्रा: भाग १ प्रस्तावना

प्रस्तावना
 

नमस्ते!

हाल ही में मैने और एक साईकिल यात्रा पूरी की| यह योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा थी जिसमें लगभग ५९५ किलोमीटर तक साईकिल चलाई और लगभग योजना के अनुसार ही यह यात्रा पूरी हुई (सिर्फ कुछ कारण से एक पड़ाव कम हुआ)| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा थी| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलना हुआ| अब इस यात्रा का विवरण लिखना शुरू कर रहा हूँ|

पहली बात तो यह है कि किसी‌ भी विषय का प्रसार करना हो, तो कई मुद्दे उपस्थित होते हैं| सीधा प्रसार हमेशा ही कारगर साबित नही होता है| कई लोग बार बार आग्रह करने पर उस चीज़ की तरफ जा सकते हैं, पर यह सभी के लिए लागू नही होता है| मेरा अपना उदाहरण यही है कि जब जब मुझे किसी चीज़ के बारे में आग्रह किया गया, अक्सर मैने उससे दूर ही गया| इसलिए योग प्रसार करना इतनी सरल बात नही है| मेरा विश्वास प्रत्यक्ष प्रसार के बजाय अप्रत्यक्ष प्रसार में हैं| किसी को योग कीजिए, ऐसा बताने के बजाय खुद उसे करते रहने में है| और इस यात्रा में भी कुछ ऐसा ही हुआ| जैसे यह एक साईकिल यात्रा है और साईकिल सन्देश और साईकिल प्रसार भी इसका एक अन्दरूनी पहलू है| मैने किसी से भी नही कहा कि साईकिल चलाईए, लेकीन हर जगह कुछ लोग अपने आप साईकिल चलाते दिखे! इसके साथ हर जगह पे योग- साधकों से बहुत अच्छा मिलना हुआ| योग का एक अर्थ जोड़ है और इस पूरी यात्रा में भी कई लोगों‌ से जुड़ना हुआ| हर गाँव में कार्यकर्ताओं की टीम में भी नए लोग कहीं कहीं जुड गए| यह साईकिल यात्रा उनके जुड़ने के लिए एक माध्यम बनी| अप्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से योग को बढ़ावा मिला| एक साईकिल पर आए यात्री से मिल कर कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं का भी हौसला बढ़ा| इसका श्रेय साईकिल को जाता है, उसमें होनेवाले इनोवेशन को जाता है| 



इस साईकिल पर तैयारी करते हुए!

Sunday, May 6, 2018

योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा


महाराष्ट्र में परभणी- जालना- औरंगाबाद- बुलढाणा जिले के गाँवों में ६०० किलोमीटर साईकिलिंग

नमस्ते!


एक नई सोलो साईकिल यात्रा करने जा रहा हूँ| जिसके बारे में संक्षेप में आपसे बात करूँगा| पीछले साल महाराष्ट्र के सातारा क्षेत्र में योग- ध्यान इस विषय को ले कर एक छोटी यात्रा की थी| इस बार भी 'योग प्रसार हेतु साईकिल यात्रा' ऐसा विषय ले कर साईकिल चलाऊँगा| मध्य महाराष्ट्र के परभणी जिले में कार्यरत 'निरामय योग प्रसार एवम् अनुसंधान संस्था' तथा उसके कार्य का विस्तार को ले कर यह यात्रा है| मध्य महाराष्ट्र के परभणी, जालना, औरंगाबाद एवम् बुलढाणा जिलों में काम करनेवाले योग- कार्यकर्ता, योग अध्यापक इनसे इस यात्रा में मिलूँगा|

परभणी जिले में चार दशक से निरामय संस्था का कार्य चल रहा है| १९७० के दशक में कुछ व्यक्तियों ने साथ आ कर योग सीखना और सीखाना चालू किया| उसके बाद कई कार्यकर्ता जुड़ते गए| कार्य बढता गया| योग साधना और योग अध्यापन के साथ योग में अनुसंधान, योग परिषद में सहभाग, योग प्रसार, योग अध्यापकों को शिक्षा आदि कार्य बढ़ते गए| बाद में इसका विस्तार परभणी जिले के गाँवों में और फिर अन्य जिलों में भी हुआ| वहाँ भी कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी हुई| यह पूरा कार्य स्वयं के योगदान से कार्यकर्ता करते रहे हैं| आज जब अधिकांश संस्थाएँ प्रोजेक्ट या फंडिंग होने पर ही कार्य करती हैं, ऐसे समय में इस तरह का निरपेक्ष कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण है| इसी लिए एक तरह से सोचता था कि इस कार्य को सामने लाना जरूरी है| मेरा इस कार्य से बचपन से थोड़ा परिचय है|‌ परभणी मेरा गाँव है और मेरे पिताजी इस पूरे कार्य में एक कार्यकर्ता रहे हैं|

किसी के मन में एक प्रश्न आ सकता है कि आज मध्य महाराष्ट्र के क्षेत्र में अकाल की समस्या है; पानी एवम् ग्राम विकास तथा खेती से जुड़े कई प्रश्न हैं| तो उस विषय के लिए साईकिल यात्रा करने के बजाय योग प्रसार के लिए साईकिल यात्रा कैसे कर रहा हूँ| प्रश्न स्वाभाविक भी है और सही भी है| इन दिनों पानी और खेती पर काम करने के लिए बहुत लोग सामने आ रहे हैं जो वाकई बड़ी बात है| लेकीन मेरी सोच में हर तरह के कार्य जरूरी ही होते हैं| हर कोई अपनी रुचि एवम् अपने विचारों के साथ ऐसे कार्य में सहभाग लेता हैं| इसके अलावा मै यह भी मानता हूँ कि योग का सम्बन्ध समूचे व्यक्तित्व से है| अगर कोई व्यक्ति योग की दिशा में आगे बढ़ता है तो वह अपनी सभी समस्याओं से निपटने की दिशा में भी एक कदम आगे बढ़ेगा ही| मैने आज तक जो योग जाना है, उसका अभ्यास किया है, साईकिलिंग से मुझे जो मिला है, उसके आधार पर यह मेरा अनुभव रहा है| इसलिए प्रत्यक्ष रूप में न होता हो तो भी अप्रत्यक्ष रूप में योग प्रसार भी सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की दिशा में ले जानेवाला एक कदम है| खैर|

यह पूरी यात्रा मध्य महाराष्ट्र के अत्यधिक गर्मी होनेवाले इलाके में होगी| हर रोज लगभग ५५- ६० किलोमीटर साईकिल चलाऊँगा| इस क्षेत्र में दो- तीन शहर छोड कर बाकी गाँव ही हैं| और जब भी मैने गाँवों में साईकिल चलाई हैं, तब लोग यही कहते हैं- ओह गेअर की साईकिल! तो फिर यह तो मोटर साईकिल जैसी दौड़ती होगी! इस बार इसी लिए एक साधारण सी साईकिल (दुधवाला साईकिल) पर यह यात्रा करूँगा| ताकी लोगों को ऐसा सोचने का मौका न मिले और साईकिल सम्बन्धी जो प्रश्न पूछे जाते हैं, उनसे मुझे भी राहत मिलेगी! लोगों को भी यह समझ में आएगा की ठीक उनकी ही साईकिल भी इतनी चलायी जा सकती है| लोगों को शायद पता हो ना हो की यह दुधवाला टाईप की साईकिल भी इतनी दूर तक जा सकती हैं, मुझे तो बिल्कुल पता नही था| इसलिए जब इस तरह की साईकिल से ५०, ६० किलोमीटर साईकिलिंग की, तो मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला| साईकिलिंग की योजना कुछ इस प्रकार है| ११ मई से परभणी से शुरू करूँगा| हर दिन सुबह ४-५ घण्टे साईकिल चलाऊँगा और हर रोज ५५- ६० किलोमीटर दूरी पार करूँगा| उसके बाद लॅपटॉप पर मेरा रूटीन काम भी जारी रखूँगा| इसका रूट कुछ इस प्रकार होगा- परभणी- जिंतूर नेमगिरी- परतूर- अंबड- औरंगाबाद- देवगिरी किला- औरंगाबाद- जालना- सिंदखेड राजा- देऊळगांव राजा- चिखली- मेहकर- लोणार सरोवर- मंठा- मानवत- परभणी| लगभग १२ दिनों में ६०० किलोमीटर से अधिक साईकिल चलाने की योजना है| योग कार्य विस्तार एवम् योग- अध्यापक और केन्द्र इनके अनुसार यह रूट बनाया है|

इस यात्रा का एक उद्देश्य योग कार्य को सामने लाना यह है| उसके साथ इस रूट पर और इन केन्द्रों में होनेवाले योग अध्यापक- योग कार्यकर्ताओं से संवाद भी करूँगा| कई योग कार्यकर्ताओं ने बड़ी चुनौतिभरी स्थिति में कार्य किया है|‌ कुछ महिलाओं ने कई अवरोधों पर मात करते हुए पहले यह पाठ्यक्रम पूरा किया और उसके बाद उतनी ही कठिन स्थिति में योग अध्यापन भी किया| कुछ कार्यकर्ता तो किसी रोग के कारण योग करने लगे और अब उनकी रोग को धन्यवाद देते हैं! ऐसे कई कार्यकर्ता और कई अनुठे उदाहरण इस यात्रा में मिलेंगे जिनके बारे में बाद में लिखूँगा|

अगर आप चाहे तो इस कार्य से जुड़ सकते हैं| कई प्रकार से इस प्रक्रिया में सम्मीलित हो सकते हैं| अगर आप मध्य महाराष्ट्र में रहते हैं, तो यह काम देख सकते हैं; उनका हौसला बढ़ा सकते हैं| आप कहीं दूर रहते हो, तो भी आप निरामय संस्था की वेबसाईट देख सकते हैं; उस वेबसाईट पर चलनेवाली ॐ ध्वनि आपके ध्यान के लिए सहयोगी होगी| वेबसाईट पर दिए कई लेख भी आप पढ़ सकते हैं| और आप अगर कहीं दूर हो और आपको यह विचार ठीक लगे तो आप योगाभ्यास कर सकते हैं या कोई भी व्यायाम की एक्टिविटी कर सकते हैं; जो योग कर रहे हैं, उसे और आगे ले जा सकते हैं; दूसरों को योग के बारे में बता सकते हैं; आपके इलाके में काम करनेवाली योग- संस्था की जानकारी दूसरों को दे सकते हैं; उनके कार्य में सहभाग ले सकते हैं|

निरामय संस्था को किसी रूप से आर्थिक सहायता की अपेक्षा नही है| लेकीन अगर आपको संस्था को कुछ सहायता करनी हो, आपको कुछ 'योग- दान' देना हो, तो आप संस्था द्वारा प्रकाशित ३५ किताबों में से कुछ किताब या बूक सेटस खरीद सकते हैं या किसे ऐसे किताब गिफ्ट भी कर सकते हैं| निरामय द्वारा प्रकाशित किताबों की एक अनुठी बात यह है कि कई योग- परंपराओं का अध्ययन कर और हर जगह से कुछ सार निचोड़ कर ये किताबें बनाईं गई हैं| आप इन्हे संस्था की वेबसाईट द्वारा खरीद सकते हैं| निरामय संस्था की वेबसाईट- http://www.niramayyogparbhani.org/ इसके अलावा भी आप इस प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं| आप यह पोस्ट शेअर कर सकते हैं| निरायम की वेबसाईट के लेख पढ़ सकते हैं| इस कार्य को ले कर आपके सुझाव भी दे सकते हैं| इस पूरी यात्रा के अपडेटस मै मेरे ब्लॉग पर देता रहूँगा- www.niranjan-vichar.blogspot.in (यहाँ आप मेरी पीछली साईकिल यात्राएँ, अन्य लेख आदि पढ़ सकते हैं)| आप मुझसे फेसबूक पर भी जुड़ सकते हैं| बहुत बहुत धन्यवाद!

- निरंजन वेलणकर
niranjanwelankar@gmail.com



Tuesday, January 2, 2018

जनवरी में लदाख़ में साईकिलिंग की योजना

जनवरी में लदाख़ में साईकिलिंग

जनवरी में जम्मू- कश्मीर राज्य के लदाख़ क्षेत्र में तपमान -२० से -२५ तक नीचे जाता है| इस क्षेत्र का मुख्य नगर लेह सिर्फ हवाई जहाज से दुनिया से जुड़ा रहता है| ऐसे स्थिति में भी कुछ लोग लदाख़ में जाते है और सर्दियों में भी वहाँ घूमते हैं| पहले दो बार लेह देखा है, लेकीन वह गर्मियों के महने में देखा है| इसलिए एक बार वहाँ सर्दियों में जाकर देखना है| ऐसे प्रतिकूल मौसम में जितनी हो सके, उतनी साईकिल चलानी है| लेह के आसपास की सड़के खुली रहती है, इसलिए लेह से कारू, निम्मू और हो सके तो खार्दुंगला भी जाया जा सकता है| खार्दुंगला सड़क मिलिटरी के लिए बहुत अहम है, इसलिए उसे हर स्थिति में चालू रखा जाता है| ५३०० मीटर ऊँचाई का खार्दुंगला दर्रा सर्दियों में भी चालू रहता है| हालाकी बीच बीच में भारी बर्फबारी के चलते कभी कभी बन्द हो सकता है|

ऐसे समय में लदाख़ जाने के कुछ उद्देश्य भी है-
१. सर्दियों के विषम मौसम में वहाँ के लोग किस प्रकार रहते हैं और वहाँ जवान और सेना के अन्य लोग किस प्रकार काम करते हैं, इसका अनुभव लेना|
२. वहाँ के लोग और जवानों के साथ २६ जनवरी के कार्यक्रम में अनौपचारिक रूप से संवाद करना|
३. शरीर की क्षमताओं को चुनौति देना और उसकी क्षमता की परख करना|
४. साईकिल चलाना हमेशा कुछ सन्देश देता है- पर्यावरण के प्रति संवेदना और फिटनेस के बारे में जागरूकता|



फोटो स्रोत: http://travel.paintedstork.com/blog/2013/02/leh-ladakh-winter.html

तैयारी

इस यात्रा की इच्छा हाल ही में अच्छी साईकिलिंग करने के बाद हुई| जो घाट और चढाईयाँ कभी कठिन लगती थी, वहाँ जब आसानी साईकिल पर जा सका, तब लगने लगा कि अब इससे भी ऊँचे पर्वत पर भी साईकिल चला सकता हूँ- अर्थात् लदाख़ में साईकिल चला सकूँगा| तैयारी कुछ इस तरह से की है-

- नियमित रूप से साईकिल चलाना; चढाई की सड़कों पर साईकिल बार बार चलाना|
- साईकिल का स्टैमिना बढ़ाने के लिए रनिंग शुरू की जिसका पीछली साईकिल यात्रा में बहुत लाभ मिला| धीरे धीरे रनिंग बढाता गया और २१ किलोमीटर तक दौड सका| इसके बाद ग्रेड १ की चढाई पर भी रनिंग कर सका| इस तरह साईकिल चलाने के साथ रनिंग करना भी तैयारी का हिस्सा रहा|
- योगासन और प्राणायाम

ठण्ड के लिए तैयारी अभी जारी है| कम से कम कपडों के तीन- चार लेअर लेह में पहनने पड़ेंगे| थर्मल और इनर के साथ तीन जुराब- सड़क पर चलते समय गम बूट और नाक छोड कर पूरे शरीर को ढाकने का इन्तजाम करना होगा| और ठण्ड की वास्तविक तैयारी मानसिक होगी| ठण्ड का इतना बड़ा तो नही; पर छोटा- मोटा अनुभव है जब दिसम्बर में बद्रीनाथ के पास गया था| वहाँ लेकीन ऊँचाई बहुत कम थी; फिर भी शाम को साढ़ेपाँच बजे जैसे रात होती थी| और एक तरह का आलस आ जाता था|

इस बार भी शायद यही चुनौति सबसे बड़ी है| इसके साथ लेह में सर्दियों में कारोबार बहुत कम चालू रहता है| इसलिए सुविधाओं की भी दिक्कते हैं| साईकिल उपलब्ध होने से दिक्कते हैं| दिन देर से शुरू होता है और जल्द डूबता है, साईकिल चलाने के लिए मुश्कील से आठ- नौ घण्टे होंगे| इन सबकी तैयारी कर रहा हूँ| लेह में पीछली बार जहाँ ठहरा था, वहाँ चोगलमसर क्षेत्र के मित्र के पास रूकूँगा|

साईकिलिंग की योजना
पुणे- दिल्ली- लेह हवाई जहाज से २४ जनवरी की सुबह लेह आगमन|
२६ जनवरी तक पूरी तरह विश्राम जिससे शरीर उस मौसम से तालमेल बिठा सके|
२६ जनवरी के कार्यक्रम में सहभाग लेना और लेह घूमना- साईकिल का जुगाड़|
२७ जनवरी- लेह शहर में १० किलोमीटर साईकिल चलाना|
२८ जनवरी- लेह- सिन्धू घाट परिसर में १० किलोमीटर साईकिल चलाना|
२९ जनवरी- लेह से निम्मू- चिलिंग जाना (४५ किलोमीटर)| चिलिंग में ठहरना
३० जनवरी-  चिलिंग- निम्मू- लेह वापसी (४५ किलोमीटर)|
३१ जनवरी- लेह से खर्दुंगला रोड़ पर साउथ पुल्लू तक जाना|
१ फरवरी- खार्दुंगला जाने का प्रयास| खार्दुंगला जाना सड़क खुली होने पर निर्भर करेगा|

२- ३ फरवरी अतिरिक्त दिन रखे हैं| और ४ फरवरी को लेह- दिल्ली- पुणे हवाई जहाज से वापसी|

ऐसी योजना तो बनाई है, लेकीन इसमें बहुत से if and buts हैं| शरीर इतने ठण्ड को कितना सह पाता है, ऐसी स्थिति में साईकिल कितनी चला सकता हूँ, यह कुछ भी कह नही सकता हूँ| वहाँ जाने पर ही पता चलेगा|  शायद यह भी हो सकता है कि साईकिल ना मिले या बहुत महंगे रेट से मिले, क्यों कि सभी दुकान बन्द होते हैं|| साईकिल न मिलने की स्थिति में लेह के आसपास पैदल घूमना हो सकता है| या अगर त्सोमोरिरी गाड़ी जा रही हो, तो वहाँ भी जा सकता हूँ| पर सड़क कई दिनों के लिए कभी भी बन्द हो सकती है| इसलिए सब कुछ उस समय की स्थिति पर निर्भर करेगा|

लेकीन जो भी हो, एक बहुत अविस्मरणीय अनुभव जरूर आनेवाला है. . . . 

Friday, December 29, 2017

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ९ (अन्तिम): अजिंक्यतारा किला और वापसी

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा १: असफलता से मिली सीख
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा २: पहला दिन- चाकण से धायरी (पुणे)  
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ३: दूसरा दिन- धायरी (पुणे) से भोर  
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ४: तिसरा दिन- भोर- मांढरदेवी- वाई  
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ५: चौथा दिन- वाई- महाबळेश्वर- वाई
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ६: पाँचवा दिन- वाई- सातारा- सज्जनगढ़
योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ७: छटा दिन- सज्जनगढ़- ठोसेघर- सातारा

योग ध्यान के लिए साईकिल यात्रा ८: सांतवा दिन- सातारा- कास पठार- सातारा

९ (अन्तिम): अजिंक्यतारा किला और वापसी

इस यात्रा का सम्बन्ध ध्यान- योग से किस प्रकार है, यह जानने के लिए यह पढ़िए|

५ अक्तूबर की सुबह| आज इस यात्रा का अन्तिम पड़ाव है| आज अजिंक्यतारा किला देख कर वापस जाना है| कल- परसो जब भी‌ इस किले के पास से जाता था तो इस किले को देख कर डर सा लगता था| अतीत में एक बार इस किले पर मोटरसाईकिल पर गया था, लेकीन उस समय बड़ी मुश्कील से बाईक पहले गेअर पर चढ़ी थी| हालांकी आज के पहले लगातार कई दिनों तक मैने कई चढाईयाँ पार की है, इसलिए आगे बढ़ा| सुबह यह किला देख कर जल्दी वापस निकलना है|






सातारा गाँव में सड़क एक बार पूछ कर जल्द ही किले के पास पहुँच गया| कई लोग मॉर्निंग वॉक/ जॉगिंग करते हुए दिखाई दे रहे हैं| किले के नीचे कई संस्थाएँ दिखी जो घूमन्तू समुदायों पर काम करती हैं| धीरे धीरे आगे बढा| किला कितना बड़ा है, इसका पता चलने लगा| एक मोड़ के बाद बड़ी तिखी चढाई शुरू हुई| इस पूरी यात्रा में यही चढाई सबसे कठिन लगी| हालाकी साईकिल चला नही‌ पाऊंगा ऐसा नही लगा| इस चढाई का आनन्द लेते लेते आगे जाता रहा| यह सड़क बीच में घने पेडों से गुजरती है| सड़क के ठीक उपर ऊँचे पेडों पर एक मोर बैठ कर गूँज कर रहा था! तेज़ चढाई होने के कारण फोटो के लिए नही‌ रूका| आखिर कर इस लगभग दो- ढाई किलोमीटर की चढाई के लिए करीब पच्चीस मिनट लगे|